Contact: +91 844 894 1008
bgwebsite_logo
Bhagavad Gita
The Song of God

Bhagavad Gita: Chapter 13, Verse 34

यथा प्रकाशयत्येक: कृत्स्नं लोकमिमं रवि: |
क्षेत्रं क्षेत्री तथा कृत्स्नं प्रकाशयति भारत || 34||

यथा-जैसे; प्रकाशयति-आलोकित करता है; एकः-एक; कृत्स्नम्-समस्त; लोकम् ब्रह्माण्ड प्रणालियाँ; इमम्-इस; रविः-सूर्य क्षेत्रम्-शरीर; क्षेत्री-आत्मा; तथा उसी तरह; कृत्स्नम्-समस्त; प्रकाशयति-आलोकित करता है; भारत-भरतपुत्र, अर्जुन।

Translation

BG 13.34: जिस प्रकार से एक सूर्य समस्त ब्रह्माण्ड को प्रकाशित करता है उसी प्रकार से आत्मा पूरे शरीर को प्रकाशित करती है।

Commentary

यद्यपि आत्मा जिस शरीर में रहती है उसे ऊर्जा प्रदान करती है फिर भी वह स्वयं अत्यंत सूक्ष्म है। "एषोऽणुरात्मा" (मुंडकोपनिषद्-3.1.9) “आत्मा का आकार अत्यंत अणु है।" श्वेताश्वतरोपनिषद् में वर्णन ह

बालाग्रशतभागस्य शतधा कल्पितस्य च।

भागोजीवः स विज्ञेयः स चानन्त्याय कल्पते।। 

(श्वेताश्वतरोपनिषद्-5.9)

 "यदि हम बाल के अग्र भाग के सौ टुकड़े करें और फिर इनमें से एक टुकड़े के पुनः सौ टुकड़े करें तब हम आत्मा के आकार को समझ सकते हैं। इनकी संख्या असंख्य है।" यह एक प्रकार से आत्मा की सूक्ष्मता को व्यक्त करने की विधि है। सूक्ष्म आत्मा उन शरीरों को कैसे गतिशील रखती है जो इतनी विशाल है। श्रीकृष्ण सूर्य की उपमा देकर इसे स्पष्ट करते हैं। यद्यपि सूर्य एक ही स्थान पर स्थिर रहता है किंतु वह सम्पूर्ण सौरमण्डल को अपने प्रकाश से प्रकाशित करता है। वेदांत दर्शन में भी ऐसा वर्णन किया गया ह

गुणाद्वा लोकवत् 

(वेदांत दर्शन-2.3.25) 

"हृदय में स्थित आत्मा समस्त क्षेत्र को चेतना प्रदान करती है।"

Bookmark this Verse

Sign in to save your favorite verses.

Add a Note
Swami Mukundananda
13. क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग

Quick Jump to Any Verse

Navigate directly to the wisdom you seek

Book with feather

Stay Connected!

Verse of the Day

Start your day with the timeless inspiring wisdom from the Holy Bhagavad Gita delivered straight to your email!

Thanks for subscribing to "Bhagavad Gita - Verse of the Day"!